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शहीद कवि फौजी मेहर सिंह के गाए किस्सों में से एक किस्सा : सत्यवान-सावित्री

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शहीद कवि फौजी मेहर सिंह के गाए किस्सों में से एक किस्सा : सत्यवान-सावित्री शहीद कवि फौजी मेहरसिंह ने प्रेम-प्रधान, नीति प्रधान, देशभक्ति प्रधान आदि तीन प्रकार के किस्सों की रचना की। साहित्यकार डॉ. संतराम देशवाल बताते हैँ कि वे फौजी जवान और किसान की अनसुनी और अनदेखी पीड़ाओं के अनूठे चितेरे हैं।      सत्यवान -सावित्री का किस्सा नीति-प्रधान है। इसमें पतिव्रता नारी किस तरह अपने पति के प्राण बचा लेती है इसका वर्णन है।              बताया गया है कि राजा अश्वपति  के घर  देवी के वरदान से कन्या पैदा हुई ,जिसका नाम सावित्री रखा गया। जब सावित्री जवान हुई तो सर्वत्र घूमने पर भी राजा को उसके योग्य वर नहीं मिला। इस पर राजा ने सावित्री को खुद अपने योग्य वर ढ़ूंढ़ने की अनुमति दे दी। रागनी में बताया कि- " अरथ जुड़ा कै चाल्य पड़ी,कितै वर जोड़ी का पावै,   उस मालिक का भजन करूँ, जै मेरी जोट मिलावै ...।             सावित्री चलते चलते एक जंगल में पहुंचती है तो उसे एक युवक लकड़ी काटता हुआ मिलता है। ...

कुत्ता मार बणजारा रोया,आज वाहे कहाणी बणगी, मैं काल़ा तूं भूरी थी, आज क्यूकर राणी बणगी...

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शहीद कवि फौजी मेहर सिंह का गाया किस्सा : अंजना पवन लेखक एवं स्वतंत्र पत्रकार सुभाष ने 1993 में नवभारत टाइम्स में "रागनी वाला सिपाही फौजी मेहर सिंह" के नाम से लेख लिखा। बताया गया है कि फौज से आखिरी रागनी कवि मेहरसिंह ने अपने पिता के नाम भेजी थी। जिसमें उन्हांने अपने मित्रों, माता-पिता, भाई व अपनी पत्नी को सांत्वना दी कि यदि वे लड़ाई में शहीद हो जाएं तो लोग मन न मनाएं, क्योंकि वे देश के लिए शहीद होंगे। इस पर उन्होंने एक रागनी में गाया कि - साथ रहणियांसंग के साथी, दया मेरे पै फेर दिया।  देश के ऊपर ज्यान झोंक दी, लिख चिट्‌ठी में गेर दियो...।। फौजी मेहर सिंह के गाए किस्सों में एक किस्सा है अंजना- पवन      एक समय की बात है। रतनपुरी में राजा विद्यासागर राज किया करते।उनकी रानी का नाम केतुमती था ।उनका पुत्र पवन एक महान योद्धा था। पवन रंग का सांवला था, परन्तु  उसकी शौर्यगाथा चारों तरफ  फैली हुई थी।  महेन्द्रपुर नगरी के राजा महेन्द्र सिंह की लड़की अंजना राजकुमार पवन की वीरता से बेहद प्रभावित थी।   अंजना के विवाह के लिए राजकुमारों के फोटो मंगवाकर ...

शहीद फौजी मेहरसिंह : तख्त पर सांग नहीं गाया पर लोक गायकी में इतिहास में दर्ज है नाम

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 होगी कुनबा घाणी,कित राजा कित राणी,     कित सरवर कित नीर,कित बन्दे की ज्यान सै। जितेंद्र बूरा. सोनीपत जिले के बरोणा गांव में जन्में फौजी मेहरसिंह एक सुप्रसिद्ध किस्साकार हुए हैं। वर्ष 1936 में 18 से 20 की उम्र में वे फौज में भर्ती हुए। स्वतंत्रता सेनानियों में उनका अहम नाम है। समसपुर गांव में प्रेमकौर से उनकी शादी हुई। दो कारणों से उन्होंने सांग का बेड़ा बांधकर सांग नहीं किए। पहला, उन पर आर्य समाज का गहरा प्रभाव था और दूसरा, उन्होंने अपने पिता जी को वचन दे दिया था कि वे सांग नहीं करेंगे। उनके पिता नहीं चाहते थे कि वे सांग गाएं।  फिर भी, उन्होंने फौज की नौकरी के दौरान लेखन और गायन जारी रखा, लेकिन समकालीन सांगियों की तरह कभी तख्त पर सांग नहीं गाया। साथियों के साथ आजाद हिंद फौज में शामिल हुए। वर्ष 1945 में रंगून में वे शहीद हो गए और अपनी दास्तां इतिहास के पन्नों के लिए छोड़ गए। उनके असल चित्र तक नहीं मिल सके। हालांकि बरोणा गांव में उनकी प्रतिमा शहीद स्मारक समिति ने लगवाई है। - छुट्‌टी के दिन पूरे हो लिए, फिकर करण लाग्या मन में।  बांध बिस्तरा चाल प...