वो उड़ते कबूतरों की तस्वीर के बीच लिखा हैप्पी न्यू ईयर... चूल्हे की आग में दफन हो जाती थी भावनाएं..

... कढ़ाई में उबल रहा दूध मलाई दे रहा है, तुम्हारा दोस्त तुम्हे नए साल की बधाई दे रहा है। ... लक्श जैसी खुशबू हमाम में नहीं, तेरे जैसा दोस्त हिंदुस्तान में नहीं। ... गुल खिलते हैं तो गुलशन भी खिलेंगे, जिंदगी रही तो जरूर मिलेंगे। ... जब दोस्ती की दास्तां वक्त सुनाया करेगा, तब हमें भी कोई स्वरूप याद आया करेगा। भूल जाएंगे हर गम को हम, जब तुुम्हारे साथ बिताया हुआ वक्त याद आया करेगा।। ये हैं 70 से 90 के दशक के बीच के उन गालिबों की भावनाएं जो हर नए साल ग्रीटिंग कार्ड्स में सिमेटकर दिया करते थे। जितेंद्र बूरा. जीवन के हर पड़ाव में बदलाव कुदरत का करिश्मा है। बदलते समय के दस्तूर को याद रखने के लिए सेकेंड, मिनट, घंटे, तारीख, महीने, साल की गणना में पिरो दिया गया। हर पल, हर समा, हर पहर, हर दिन, हर रात, हर मौसम में जीये जिंदगी के अहसास को बस इन्हीं तारीखों और पलों के फ्रेम में सजाया जाता है। हमारे दिमाग की हार्ड डिस्क के किसी कौने में यह सुरक्षित रखा है। जब भी भावनाओं के दरवाजे खुलते हैं तो मन अंदर जाकर एक-एक फ्रेम को उठाकर निहारता है। फिर आंखों के पर्दे पर उस दौर का फिल्मांकन होता ...