महाभारत कालीन इस स्थल पर आज भी पीपल के पत्तों में होता है छेद, बाबा श्याम के इस धाम की दूर तक मान्यता
जहां दिया है शीश का दान... वो भूमि है पावन चुलकाना धाम
- फाल्गुन द्वादसी के उपलक्ष्य में लगता है विशेष मेला, कई प्रदेश से आते हैं श्रद्धालु
सोनीपत, पानीपत।
महाभारत काल का एक ऐसा पवित्र स्थल। यहां एक बाण से पीपल के सभी पत्तों को भेद दिया गया। आज भी यहां पीपल के पत्तों में छेद होता है। महान योद्धा बर्बरीक ने श्रीकृष्ण को अपने शीश का दान दिया। बात हो रही है..
हारे का सहारा, बाबा श्याम के चुलकाना धाम की। फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी व द्वाद्वशी को श्याम बाबा पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। हरियाणा के अलावा दिल्ली, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हिमाचल, उत्तरांचल और दक्षिण भारत के अनेकों जगहों से श्रद्धालु पहुंचकर सुख-समृद्धि की कामना करते है। कालांतर के समय से यहां श्री श्याम बाबा का मेला लगता है। मंदिर में श्याम बाबा के अलावा हनुमान, कृष्ण बलराम, शिव परिवार सहित अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित है।
पानीपत के समालखा कस्बे से 3 किलोमीटर दूरी चुलकाना गांव अब सिर्फ गांव न रहकर, चुलकाना धाम के नाम से प्रसिद्ध है। श्री श्याम खाटू वाले का प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर चुलकाना गांव में है। जैसे ही गांव में मंदिर की स्थापना हुई और खाटू नरेश चुलकाना नरेश भी बन गए। चुलकाना धाम को कलिकाल का सर्वोत्तम तीर्थ माना गया है। यहां पीपल के पेड़ के पत्तों में आज भी छेद है, जिसे मध्ययुग में महाभारत के समय वीर बर्बरीक ने अपने बाणों से भेदा था। महाभारत कालीन पेड़ पर भक्त मन्नत का धागा बांधते है और पीपल के पेड़ के नीचे ही ज्योत लगाते है। राजस्थान के बाद चुलकना धाम ही सबसे बड़ी धाम माना जाता है। हालांकि जींद के पड़ाना, सोनीपत शहर, सोनीपत के नकलोई गांव और प्रदेश में अन्य जगह भी श्याम बाबा के पवित्र मंदिर हैं।
कुंड की मिट्टी निकाल की जाती पूजा-
चुलकाना धाम में जोहड़ में से मिट्टी निकाली जाती थी, मिट्टी के 7 पिंड बनाकर उनकी पूजा की जाती थी। अब यहां जोहड़ की जगह श्याम कुंड बन गया है। लेकिन कुंड में आज भी मिट्टी निकालकर पूजा की जाती है। यहां पर बच्चों के बाल चढ़ाए जाते है और नवविववाहित गठजोड़ों की जात दी जाती है। ये मान्यता प्राचीन काल से चली आ रही है।
दूध की खीर बना बांटा जाता प्रसाद-
श्रद्धालु सोनू शर्मा छदिया ने बताया कि फाल्गुन महीना बाब श्याम का पवित्र महीना है क्योंकि इस में शुक्ल पक्ष की द्वाद्वशी को वीर बर्बरीक ने अपने शीश का दान भगवान श्रीकृष्ण को इसी चुनकट ऋषि की तपोभूमि पर दिया था। उसी महाभारत काल से यहां श्री श्याम बाबा की पूजा अर्चना हो रही है। समय-समय पर बाबा यहां अपनी शक्ति के चमत्कार दिखाता रहता है। वीर बर्बरीक स्वयं श्री श्याम के रूप में यहां साक्षात विराजमान है। उन्होंने बताया कि जिन परिवारों के कुल की मान्यता है उन परिवारों के सदस्य एकादशी व द्वाद्वशी को ही पूजा अर्चना करने के लिए आते है। श्याम बाबा के मेले पर किसी भी घर में दूध नहीं बेचा जाता, उस दूध को या उसकी खीर बनाकर चुलकाना में जाकर चढ़ाते है। खीर, चूरमा, अनाज, दूध, आटा और प्रसाद भी चढ़ाया जाता है।
रंग गुलाल और फूलों की होली खेलते जाते धाम-
चुलकाना धाम में अनेकों स्थानों से श्री श्याम बाबा की पैदल ध्वज यात्रा, रथ यात्रा जाती है। श्रद्धालु रंग गुलाल व फूलों की होली खेलते हुए चुलकाना धाम आते है। मेले के दौरान चुलकाना में जगह-जगह पर भंडारा लगाया जाता है, दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पार्किंग की व्यवस्था की जाती है। इतना ही मेले के आसपास बड़े-बडे़ झूले लगे है।
मेले में कराया जाता दंगल- सरपंच
चुलकाना गांव के पूर्व सरपंच मदन शर्मा ने बताया कि श्री श्याम बाबा के मेले पर हर साल दंगल का आयोजन किया जाता है। गांव वासियों द्वारा इस बार भी विशाल दंगल का आयोजन किया जाएगा। विजेता पहलवानों को नकद इनाम राशि देकर सम्मानित किया जाता है। बताया कि हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश, दिल्ली सहित अन्य जगहों से नामी पहलवान दंगल में आते है। दंगल में लड़कियां भी कुश्ती लड़ती है।।
इसलिए कहा जाता हारे का सहारा --
चुलकाना धाम का संबंध महाभारत से जुड़ा है। पांडव पुत्र भीम के पुत्र घटोत्कच का विवाह दैत्य की पुत्री कामकन्टकटा के साथ हुआ। इनका पुत्र बर्बरीक था। बर्बरीक को महादेव एंव विजया नामक देवी का आशीर्वाद प्राप्त था। उनकी आराधना से बर्बरीक को तीन बाण प्राप्त हुए, जिनसे वह सृष्टि तक का संहार कर सकते थे। बर्बरीक की माता को संदेह था कि पांडव महाभारत युद्ध में जीत नहीं सकते। पुत्र की वीरता को देख माता ने बर्बरीक से वचन मांगा कि तुम युद्ध तो देखने जाओ, लेकिन अगर युद्ध करना पड़ जाए तो तुम्हें हारने वाले का साथ देना है। मातृभक्त पुत्र ने माता के वचन को स्वीकार किया, इसलिए उनको हारे का सहारा भी कहा जाता है। माता की आज्ञा लेकर बर्बरीक युद्ध देखने के लिए घोड़े पर सवार होकर चल पड़े। उस समय पांडव जीत रहे थे। यानी, बर्बरीक युद्ध में आता तो हारने वाले कौरवों की तरफ से पांडवों का सामना करता। तक श्रीकृष्ण ने उनको रोकने के लिए लीला रची।
श्रीकृष्ण ने उनका परिचय जानने के बाद ही पांडवों को आने के लिए कहा। श्रीकृष्ण लीला रच कर ब्राह्मण का वेश धारण कर बर्बरीक के पास पहुंचे। बर्बरीक उस समय पूजा में लीन थे। पूजा खत्म होने के बाद बर्बरीक ने ब्राह्मण रूप में श्रीकृष्ण को कहा कि मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं?
श्रीकृष्ण ने कहा कि जो मांगू क्या आप देंगे। बर्बरीक ने कहा कि मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है, फिर भी आपकी दृष्टि में कुछ है तो मैं देने के लिए तैयार हूं। श्रीकृष्ण ने शीश का दान मांगा। बर्बरीक ने कहा कि मैं शीश का दान दूंगा, लेकिन एक ब्राह्मण कभी शीश दान नहीं मांगता। आप सच बताएं कौन हो? श्रीकृष्ण ने वास्तविक रूप में प्रकट हुए तो उन्होंने पूछा कि आपने ऐसा क्यों किया? तक श्रीकृष्ण ने कहा कि इस युद्ध की सफलता के लिए किसी महाबली की बली चाहिए। धरती पर तीन वीर महाबली हैं- मैं, अर्जुन और तीसरे तुम हो, क्योंकि तुम पांडव कुल से हो। रक्षा के लिए तुम्हारा बलिदान सदैव याद रखा जाएगा। बर्बरीक ने देवी-देवताओं का वंदन किया और माता को नमन कर एक ही वार में शीश को धड़ से अलग कर श्रीकृष्ण को शीश दान कर दिया। श्रीकृष्ण ने शीश को अपने हाथों में ले अमृत से सींचकर अमर करते हुए एक टीले पर रखवा दिया। उसी जगह खाटू का मंदिर है।
इन रास्तों से पहुंचे श्याम बाबा के दरबार-
- पानीपत की तरफ आने वाले भक्तजन समालखा रेलवे रोड से होते हुए चुलकाना गांव, दिल्ली की तरफ से आने वाले श्रद्धालु पट्टीकल्याणा गांव के सामने भोड़वाल माजरी गांव से चुलकाना गांव, सोनीपत व गन्नौर से श्रद्धालु गढ़ी झंझारा गांव से होते हुए चुलकाना गांव, रोहतक की ओर से आने वाले श्रद्धालु इसराना से किवाना से निकल चुलकाना गांव में श्याम बाबा के मंदिर में बाबा के दरबार में पहुंचे।
यह लेख मेरे दिल को छू गया है। आपने इस विषय पर मेरे अंदर की भावनाओं को सही ढंग से बयां किया है। मेरा यह लेख भी पढ़ें खाटू श्याम मंदिर का इतिहास
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