मकर संक्रांति : रूठे को मनाने व जरूरतमंद के सहयोग का पर्व

 

आओ अल सुबह नहाएं, किसी रूठे को मनाकर व बुजुर्गों का सम्मान कर मकर संक्रांति मनाएं

जितेंद्र बूरा. 

माघ महीने की कड़ाके की ठंड में सुबह 5 बजे थे। गर्म रजाई में इसी समय तो अच्छी नींद होती है, जिसे गांव में कोकला नींद बोलते हैं। मतलब आप कुछ जागे होते है कुछ सोए या फिर मीठे सपनों में खोए। लेकिन यह दिन अन्य दिन से अलग ही निकला है। माताएं तो सबसे पहले 4 बजे ही बिस्तर छोड़ चुकी है। आज चाय के पतीले में नहीं बल्कि पानी भारी मात्रा में चूल्हे, आरहे और गैस तक पर गर्म करने के लिए रखा गया। कुछ समझे। यह मकर संक्रान्ति का दिन है। इस दिन बिना नहाए नहीं रह सकते। बड़े घरों के बाथरूम गीजर भी सुबह सुबह गरम पानी से उफनलने लगते हैं। उन लोगों का तो कहना ही क्या जो आज भी पवित्र नदी या मन्दिर के सरोवर में स्नान करते हैं।

 गांव में तो कहावत भी है सूर्य निकलने से पहले नहा लिए तो शेर, नहीं तो बाद में नहाने वाला गादड ही रह जाता है। बच्चों में नहाने का उत्साह भरने का यह भी अनोखा नुस्का है। अल सुबह ही आवाज लगने लगती हैं। एक एक करके आवाज लगाकर सबको उठाने का दौर शुरु हो जाता है। बच्चों को नहलाकर तो फिर से रजाई में दुबका दिया जाता है। घर में दादा दादी बाद में नहाएंगे। अक्सर बेटों की जिम्मेदारी यह होती है कि नहाकर घर के बाहर आग यानि अलाव जलानी है। गांव में गॉसे यानी गोबर के उपलों से यह जलाई जाती है। शहर में अब कहीं कहीं सुबह घर के बाहर अलाव जलती है, जो आज भी अपनी परंपराओं से जुड़े हैं। हालांकि एक दिन पहले लोहड़ी की शाम को खूब धूम धड़ाका शहर में रहता है। घर के बाहर सुबह अलाव जलाने का मकसद पूरी तरह स्पष्ट नहीं। हां इतना जरूर है कि कड़ाके कि ठंड में नहाकर यह सर्दी भगाने में अहम भूमिका निभाती है।




रूठों को मनाने का पर्व संक्रांति

गांव में तो मकर संक्रांति को ही रूठे को मनाने का सबसे बड़ा पर्व मनाया जाता है। सुबह के स्नान के बाद पूजा अर्चना की जाती है। फिर हर घर की रसोई में से पकवानों की खुशबू हवा के झोंके के साथ सांसों में घुलने लगती है और मुंह में पानी भर आता है। हलवा, माल पुए, चूरमा जैसे मीठे पकवान इस पर्व की पहचान हैं। भोजन के बाद सब अपने काम पर निकले कोई खेत, कोई नौकरी पर। हां सब दोपहर तक वापसी का प्रयास करेंगे। किसी को मनना है तो किसी को मनाने जाना है। खासकर घर के बुजुर्गों को गर्म कम्बल या उपहार देकर आशीर्वाद लिया जाता है। आखिर उन्ही के मार्ग दर्शन और आशीर्वाद से ही तो उन्नति और तरक्की के रास्ते मिलते हैं। दानी भावना वाले लोग तो जरूरतमंद के बीच पहुंचते हैं और उन्हें गरम वस्त्र, जूते भेंट करते है। ठंड से एक दूसरे को बचाए रखने की यह सामाजिकता है। 

सामाजिकता के बीच इस दिन की रोचकता बचपन से देखते आए हैं। जब पिता के साले की बहू यानि बच्चों की मामी उनके दादा दादी को मनाने पहुंचती हैं। दादी तो घर पर मिल जाती है लेकिन दादा तो चौराहे के पास वाले पड़ोस के दादा की बैठक में हुक्का गुड़गुड़ाने पहुंच जाते हैं। वे अकेले ऐसे नहीं, बहुत से बुजुर्ग इकठ्ठा बैठते हैं। खास तौर पर यह चर्चा होती है कि देखो किस किस को मनाने पहुंचेंगे। पीतल की परात में रखकर नए कम्बल, धोती, कुर्ता, पगड़ी आदि उपहार मामी के सिर पर रखा जाता है। आस पड़ोस की महिलाएं भी इकठ्ठा हो गई। गीत गाते हुए झुंड में दादा के पास पहुंची। महिलाए बोलती हैं, जान बूझकर दूर आकर बैठे है, पर आज तो मनाकर ही छोड़ेंगे। दादा के पैर छूकर आशीर्वाद लिया जाता है।  उन्हें साथ ने लाए उपहार दिए जाते हैं और अन्य को मिठाई खिलाई जाती है। दिनभर महिलाओं कि टोलियां इसी तरह गीत गाते हुए अपने बुजुर्गों का मान सम्मान करने पहुंचती हैं।



मंदिरों और संस्थानों में लगते हैं भंडारे, कही मेले

मकर संक्रांति पर धार्मिक स्थलों, विभिन्न संस्थानों में सामाजिक लोग भंडारे लगाते हैं। दिनभर श्रद्धालु यहां प्रसाद ग्रहण करते हैं। हम भी गांव के मंदिर पर पहुंचते हैं। पूजा करते हैं, भंडारा चखते हैं। कई गांवों में कुश्ती और अन्य खेल प्रतियोगिताएं होती हैं।

मकर संक्रान्ति का प्रमुख पर्व है। मकर संक्रांति पूरे भारत और नेपाल में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तभी इस पर्व को मनाया जाता है। वर्तमान शताब्दी में यह त्योहार जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है, इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है। हरियाणा में इस दिन ठेठ नजारा होता है।

तमिलनाडु में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप में मनाते हैं जबकि कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं। मकर संक्रान्ति पर्व को कहीं-कहीं उत्तरायणी भी कहते हैं, यह भ्रान्ति है कि उत्तरायण भी इसी दिन होता है। किन्तु मकर संक्रान्ति उत्तरायण से भिन्न है।





इसके बाद समझो सर्दी ख़तम होने की उलटी गिनती शुरू

लोकल स्तर पर कहा जाता है कि जाड्डा यानि ठंड मकर संक्रांति के 15 दिन पहले और 15 दिन बाद तक ही ज्यादा होती है। इस दिन हरियाणा में तो अक्सर धुंध छाई होती है।

शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। जैसा कि निम्न श्लोक से स्पष्ठ होता है-


माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम।

स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥

मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त फलदायक है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अन्तराल पर होती है। भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात् भारत से अपेक्षाकृत अधिक दूर होता है। इसी कारण यहाँ पर रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। किन्तु मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा बसंत का आगमन और गर्म दिनों की आहट शुरू हो जाती है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अन्धकार कम होगा। अत: मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है।

हर कोई इस पर्व को अपने तरीके से मनाते हैं। खुशी बांटने के इस पर्व से जुड़े रहिए। क्योंकि खुशियां अपनों से ही मिलती हैं, गूगल से डाउलोड लोड नहीं होती।

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